Crops Grown: Cotton, Jowar, Wheat, Linseed, Gram, Fruit and Vegetable.
This Blog is only Based on education reference. The main motive is to aware visitors with knowledge regarding the topic from government exam. Hope you like it.
Translate Your Page
Wednesday, January 09, 2019
Important Notes on Indian Soil and Agriculture
Crops Grown: Cotton, Jowar, Wheat, Linseed, Gram, Fruit and Vegetable.
Monday, January 07, 2019
Human Eye
नेत्र की संरचना, समंजन क्षमता तथा दृष्टि की क्रियाविधि
नेत्र (The Eye)
यह एक संवेदी अंग है। जो वातावरण में प्रकाश अथवा अंधकार का पता लगाना तथा देखने का कार्य करता है।
नेत्र की संरचना (Structure of Eyes)
नेत्र की भित्ति या उसका गोलाकार भाग नेत्र गोलक (Eye Ball) कहलाता है। जिसका व्यास लगभग 2.5cm होता है।
नेत्रगोलक (Eye Ball)में तीन परते पाई जाती है-
श्वेत पटल (Sclera)
रक्त पटेल (Choroid)
दृष्टि पटल (Retina)
श्वेत पटल (Sclera)
इसे स्क्लेरा (Sclera) भी कहते हैं। यह सबसे बाहरी तंतुमय संयोजी ऊतकों (Fibrous conective tissue) की बनी अपारदर्शी परत है
स्क्लेरा (Sclera) का अगर भाग बाहर की ओर उभरा हुआ पाया जाता है। जिससे कॉर्निया (Cornea) कहते हैं।
कॉर्निया पारदर्शी होता है। यह प्रकाश किरणों को नेत्र में सकेंद्रित करता है।
रक्त पटेल (Choroid)
इसको कोरोइड (Choroid) भी कहते हैं। इसमें रुधिर वाहिनीयों (Blood vessels) का जाल फैला रहता है। इसकी भीतरी सतह पर नीले, भूरे अथवा लाल रंगीन कण पाए जाते है। जो प्रकाश का परावर्तन (Reflect) नहीं होने देते। जिससे प्रतिबिंब स्पष्ट बनता है।
दृष्टि पटल (Retina)
रेटीना (Retina), यह सबसे भीतरी परत है। जिसमें दो प्रकार की संवेदी कोशिकाएं (Sensory cells) पाई जाती है-
शलाका कोशिकाएं (Rod Cell)
शंकु कोशिकाएं (Cone Cell)
शलाका कोशिकाएं (Rod Cell)
छाया अथवा अंधकार में देखने के लिए संवेदी कोशिका है। इसमें रोडॉप्सिन नामक वर्णक पाया जाता है।
शंकु कोशिकाएं (Cone Cell)
तेज प्रकाश में देखने तथा रंगो का विभेद करने के लिए संवेदी कोशिकाएं हैं। इनमें आयडोप्सिन नामक वर्णक पाया जाता है।
पीत बिंदु (Yellow Spot)
रेटिना का वह भाग जहां पर शंकु (Cone) और शलाका (Rod) कोशिकाओं की संख्या बहुत अधिक पाई जाती है। उसे पीत बिंदु कहते हैं।
पीत बिंदु में शंकु कोशिकाएं अधिक और शलाका कोशिकाएं कम होती है। पीत बिंदु को मैक्युला ल्युटिया (Macula Lutea) भी कहते हैं।
पीत बिंदु पर सर्वाधिक श्रेष्ठ प्रतिबिंब बनता है।
मैक्युला ल्युटिया के बीच में एक गड्ढा होता है। जिसे फोबिया सेंटेंरेलीस (Fovea centralis) कहते हैं। जिसमें केवल शंकु कोशिकाएं पाई जाती है।
अंध बिंदु (Blind Spot)
पीत बिंदु के ठीक नीचे वह स्थान जहां से रेटिना की समस्त संवेदी कोशिकाओं (Sensory cells) से निकलने वाले तंत्रिका तंतु (Nerve fibre) एक साथ इकट्ठे होते हैं। और दृक तंत्रिका (Optic nerve) बनाते हैं, अंध बिंदु कहलाता है। क्योंकि इस स्थान पर प्रतिबिंब (Image) का निर्माण नहीं होता और शंकु व शलाका कोशिकाएं अनुपस्थित होती है।
लेंस (Lens)
नेत्र के कोर्निया भाग के पीछे की ओर पारदर्शी (Transparent), लचीला, जिलेटिन उत्तकों का बना, उभयोवतल लेंस पाया जाता है। जो किसी वस्तु का वास्तविक व उल्टा प्रतिबिंब (Real and Inverse) रेटीना पर बनाता है।
पक्ष्माभी पेशियां (Ciliary Muscle)
यह पेशियां अभिनेत्र लेंस को स्थिर रखने का कार्य करती है। यह निलंबन स्नायु (Suspensory Ligament) के द्वारा अभिनेत्र लेंस से जुड़ी रहती है।
पक्ष्माभी पेशियों (Ciliary Muscle) में गति के कारण निलंबन स्नायु (Suspensory Ligament) खींचते अथवा शिथिल होते हैं। जिससे अभिनेत्र लेंस का आकार नियंत्रित होता है।

परितारिका (Iris)
लेंस के सामने की ओर काला, भूरा अथवा नीला पर्दा होता है। जिसमें वर्तुल (Circular) तथा अरीय (Radial) पेशियां पाई जाती है।
वर्तुल पेशियां (Circular Muscle) पुतली (Pupil) को संकरा बनाने तथा अरिय पेशियां (Radial Muscle) पुतली को फैलाने का काम करती है।
पुतली (Pupil)
परितारिका के मध्य में एक रिक्त स्थान होता है। जहां से प्रकाश किरणें नेत्र में प्रवेश करती है, पुतली कहलाता है।
प्रकाश में पुतली का आकार छोटा तथा अंधकार में पुतली का आकार बड़ा हो जाता है। इसको फैलाने अथवा संकरा करने का कार्य परितारिका के द्वारा किया जाता है।
नेत्रोद द्रव (Aqueous Humour)
कॉर्निया तथा लेंस के मध्य एक जलीय द्रव भरा रहता है। जो पारदर्शी तथा स्वच्छ होता है।
काचाभ द्रव (Vitreous Humour)
लेंस और रेटिना के मध्य काचाभ द्रव भरा रहता है। जो दृष्टि पटल की सुरक्षा करता है।
ऋजु पेशियां तथा तिरछी पेशियां (Rectus and Oblique Muscle)
नेत्र गोलक को नेत्र कोटर में घुमाने के लिए छह प्रकार की कंकाली पेशियां पाई जाती है।
जिनमें से चार को ऋजु पेशियां तथा दो को तिरछी पेशियां कहते हैं। जो निम्न है-
बाह्य ऋजु पेशियां (External Rectus Muscle)
अन्तः ऋजु पेशियां (Internal Rectus Muscle)
उत्तर ऋजु पेशियां (Superior Rectus Muscle)
अधो ऋजु पेशियां (Inferior Rectus Muscle)
उत्तर तिरछी पेशियां (Superior Oblique Muscle)
अधो तिरछी पेशियां (Inferior Oblique Muscle)

प्लीका सेमिलुनेरिस (Plica semilunaris)
नेत्र के भीतर पाई जाने वाली निकटेटिंग झिल्ली को प्लीका सेमिलुनेरिस कहते हैं।
नेत्र श्लेष्मा (Conjunctiva)
यह श्लेष्मा झिल्ली (Mecous Membrane) नेत्र के अग्र भाग तथा पलकों (Eyelids) के आंतरिक भाग जो नेत्र के सम्पर्क में रहता है, को ढंकती है।
नेत्र ग्रंथियां (Eye Glands)
नेत्र में तीन प्रकार की ग्रंथि पाई जाती है-
मिबोमियन ग्रंथि (Meibomian Gland)
यह पलकों पर पाई जाती है। जो तैलीय पदार्थ का स्राव करती है। जिससे कॉर्निया चिकना बना रहता है।
सिलियरी ग्रंथि (Ciliary Gland)
इनको मोल की ग्रंथि भी कहते हैं। जो स्वेद ग्रंथि (Sweat Gland) का रूपांतरण है।
यह बिरौनियों के पास पाई जाती है। इन ग्रंथियों से निकलने वाला स्राव बिरैनियों को चिकना बनाए रखता है।

आंसू ग्रंथि (Tear Gland)
इसे लेक्राइमल ग्रंथि (Lacrymal Gland) भी कहते हैं। इसके द्वारा आंसू का स्राव किया जाता है।
आंसू में लाइसोजाइम (Lysozyme) होता है। जो सूक्ष्मजीवों (Microbs) को नष्ट करता है।
नेत्रों की संरचना, समंजन क्षमता तथा दृष्टि की क्रियाविधि The Eye
नेत्र की समंजन क्षमता (Adjustment Capacity of Eyes/ Focusing)
दूर अथवा पास की वस्तु देखने के लिए लेंस की फोकस दूरी का समायोजन (Adjestment) करना नेत्र की समंजन क्षमता (Focusing) कहलाती है।
जब हमें दूर की वस्तु देखनी होती है, तो अभिनेत्र लेंस का पतला होना तथा पास की वस्तु देखने के लिए अभिनेत्र लेंस का मोटा होना समंजन क्षमता के अंतर्गत आता है।
यदि पक्ष्माभी पेशियों (Ciliary Muscles) से जुड़े निलंबन स्नायु (Suspensory Ligament) तनते (Stretch) हैं। तो अभिनेत्र लेंस खींचता है। जिससे वह पतला हो जाता है। और उस की फोकस दूरी अधिक हो जाती है। जिसके कारण हमें दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है।
जब भी निलंबन स्नायु (Suspensory Ligament) शिथिल (Relax) होते हैं। तो अभिनेत्र लेंस पर दबाव पड़ता है। जिससे वह मोटा हो जाता है। और उस की फोकस दूरी कम हो जाती है। जिसके कारण हमें पास की वस्तुएं स्पष्ट दिखाई देती है।
त्रिविमीय दृष्टि (Three Dimensional Vision)
स्तनधारियों (Mammals) में दोनों नेत्र सामने की ओर स्थित होते हैं। जिसके कारण प्रत्येक नेत्र से बनने वाले प्रतिबिंबों अतिव्यापन (overlapping) होता है। और हमें एक ही वस्तु की त्रिविमीय संरचना दिखाई देती है।
नेत्र में पाए जाने वाले प्रोटीन
नेत्र के रेटिना में पायी जाने वाली प्रकाशसुग्राही कोशिकाओं [Photoreceptor Cells, शंकु कोशिकाएं (Cone cells) तथा शलाका कोशिकाएं (Rod Cell)] में पाए जाने वाली प्रोटीन को ओप्सिन (Opsin) कहते है। जो प्रकाशवर्णक (Photopigments) है।
शलाका कोशिकाओं (Rod Cells) में रोडॉप्सिन नामक प्रकाशवर्णक (Photopigments) पाया जाता है।
शंकु कोशिकाओं (Cone Cells) में आयडोप्सिन नामक वर्णक पाया जाता है।
दृष्टि की क्रियाविधि (Mechanism of Vision)
प्रकाश की उपस्थिति में शंकु कोशिकाएं (Cone cells) तथा छाया में शलाका कोशिकाएं (Rod Cell) देखने का कार्य करती है।
जब धीमा प्रकाश शलाका कोशिकाओं पर पड़ता है। तो शलाका कोशिकाओं में पाया जाने वाला रोडोप्सिन अलग-अलग मध्यवर्ती उत्पाद (Intermediate Product) में बदलकर रेटिनल बनाता है। इस रेटिनल के कारण तंत्रिका आवेग (Nurve Impules) उत्पन्न होता है। जो दृक तंत्रिका (Optic nerve) के द्वारा मस्तिष्क तक पहुंचाया जाता है।
रेटिनल विटामिन ए का व्युत्पन्न है जो रोडोप्सिन बनाता है।
विटामिन ए की कमी पर रोडोप्सिन नहीं बनता। जिससे रात्रि को कम दिखाई देता है। जिसको रतौंधी (Night Blindness) रोग कहते हैं।
शंकु कोशिकाओं में आयडोप्सिन वर्णक होता है। जो रंगों को देखने कार्य करता है।
आयडोप्सिन तीन प्रकार का होता है-
साइनोलैब (Cyanolabe)
क्लोरोलैब (Chlorolabe)
इरिथ्रोलैब (Erythrolabe)
साइनोलैब (Cyanolabe) नीले रंग को देखने का कार्य करती है।
क्लोरोलैब (Chlorolabe) हरे रंग को देखने का कार्य करती है।
इरिथ्रोलैब (Erythrolabe) लाल रंग को देखने का कार्य करती है।
Excretory System In Human
मानव शरीर- उत्सर्जन तंत्र (Human Body- Excretory system)
शरीर द्वारा अपशिष्ट तथा अवांछित पदार्थों का त्याग उत्सर्जन (Excretion) कहलाता है। भोजन से हमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं। ये पदार्थ पचने के बाद पाचन नलिका से रक्त कोशिकाओं द्वारा शरीर की विभिन्न ऊतक कोशिकाओं में पहुंचते हैं। कोशिकाओं के अंदर ऊर्जा के लिए ऑक्सीजन द्वारा इन पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है, जिसमें ऊर्जा के अलावा कार्बन डाईऑक्साइड, जल-वाष्प, अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल आदि हानिकारक पदार्थ बनते हैं। इनका शरीर से बाहर निकलना अति आवश्यक है, क्योंकि ये विषैले पदार्थ हैं। इनमें कार्बन डाइऑक्साइड, जल-वाष्प, वाष्प, श्वसन-क्रिया द्वारा बाहर निकल जाते हैं। एक व्यक्ति प्रति मिनट 0.2 लीटर कार्बन डाईऑक्साइड का त्याग करता है। अमोनिया, यूरिया और यूरिक अम्ल रुधिर कोशिकाओं के द्वारा यकृत में पहुंचते हैं, जहां अमोनिया यूरिया में बदल जाती है। नाइट्रोजन के यौगिक यूरिया और यूरिक अम्ल, यकृत से रक्त द्वारा गुर्दो (Kidney) में पहुंचते हैं। गुर्दे, छन्ने का काम करते हैं और इन पदार्थों को रक्त से अलग कर देते हैं। एक व्यक्ति के गुर्दे प्रति मिनट लगभग 120 मिली. रक्त छानते हैं। समस्त रक्त को छानने की क्रिया एक दिन में लगभग 30 बार होती है।
छने हुए पदार्थ में यूरिया और यूरिक अम्ल के अलावा अन्य हानिकारक पदार्थ भी पानी में घुले होते हैं। ये सभी पदार्थ मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं। एक दिन में एक व्यक्ति लगभग एक लीटर मूत्र त्याग करता है।
हमारी त्वचा भी उत्सर्जन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। त्वचा से पसीने के रूप में जल और लवण शरीर से बाहर निकल जाते हैं। एक व्यक्ति पसीने के रूप में 0.7 लीटर पानी और कुछ लवण प्रतिदिन शरीर से बाहर निकालता है।
मूत्र के असामान्य घटकघटककारणग्लूकोज़मधुमेहप्रोटीनवृक्क–रोगएसिटोनमधुमेह, भूखा रहनारक्ताणु (RBCs)मूत्र-तंत्र में संक्रमणश्वेताणु (WBCs)अधिक संख्या में होने का अर्थ है मूत्र तंत्र में संक्रमण होनायूरिक अम्ल के क्रिस्टलगठिया (गाऊट)
प्राणियों में उत्सर्जन
अमीबा तथा अन्य एक कोशिकीय प्राणियों में संकुचनशील रिक्तिका उत्सर्जन तथा परासरण-नियमन का कार्य करती है।
स्पंज और (नाइडेरिया eg.- हाइड्रा) में अपशिष्ट पदार्थ क्रमशः ऑस्कुलम एवं मुखद्वार द्वारा विसरित होती है।
छपते कृमियों में उत्सर्जन की इकाई एक कोशकीय होती है जिन्हें ज्वाला कोशिका कहते हैं।
उच्चतर जंतुओं में विभिन्न नलिकाकार संरचनाएं उत्सर्जन अंग बनाती है।
केचुएं में नलिकाकार संरचनाएं वृक्क कहलाती है।
मनुष्य में सूक्ष्म और बारीक नलिकाएं होती हैं, जिन्हे वृक्काणु (नेफ्रान) कहते हैं।
मनुष्य में दो वृक्क होते हैं तथा प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु (नेफ्रान) होते हैं
प्रोटोजोआ तथा अकोशिकीय जीव में उत्सर्जन अंग नहीं होते। उत्सर्जी पदार्थ, विसरण द्वारा प्लाज्मा झिल्ली से होकर निष्कासित होता है।
आर्थोपोडा जन्तुओं में उत्सर्जन भिन्न प्रकार से होता है, उदाहरण-
पेलिमोन, जो क्रेस्टेशिया वर्ग का जन्तु है, में हरित ग्रंथि द्वारा उत्सर्जन होता है।
कॉकरोच जो कीट वर्ग में है, में उत्सर्जन अंग मैल्पीघी नलिकाओं द्वारा होता है।
उत्सर्जी पदार्थों के आधार पर जन्तुओं का वर्गीकरण
अ. अमोनोटेलिक
इन जन्तुओं का उत्सर्जी पदार्थ मुख्यतः अति विषैली अमोनिया है, उदाहरण- कुछ मछलियाँ, सभी प्रोटोजोआ, पेरीफेरा अन्य अकशेरूकी उभयचर
ब. यूरिकोटेलिक
मुख्य उत्सर्जी पदार्थ कम विषैला यूरिक अम्ल है, उदाहरण – सरीसृप, पक्षी तथा कीट
जल में अघुलनशील, ठोस अथवा अर्द्धठोस स्वरूप
स. यूरिओटेलिक
मुख्य उत्सर्जी पदार्थ यूरिया है, उदाहरण- स्तनियों, केंचुओं, घड़ियाल कुल के सदस्यों में।
उत्सर्जन तंत्र के दोषगुर्दा निष्कार्यता (Kidney failure)गुर्दे की पथरी (Kidney stones)एक असामान्य दशा जिसमें गुर्दे मूत्र नहीं बना पाते। यह कई कारणों से हो सकता है जैसे अधिकतम दाब, आघात, बैक्टीरिया-संक्रमण अथवा टॉक्सिनों का प्रभाव।गुर्दे के द्रोणि (pelvis) क्षेत्र में विविध खनिज क्रिस्टलों का एक पिंड के रूप में एकत्रित हो जाना। ऐसी पथरियाँ मूत्र के रास्ते में अवरोध पैदा कर देती हैं।उत्सर्जी अंगउत्सर्जी पदार्थवृक्कनाइट्रोजनी पदार्थत्वचास्वेद ग्रंथियाँ द्वारा पानी यूरिया एवं अन्य लवणफुफ्फुसCO2आंतइनकी परत कुछ लवणों का उत्सर्जन करती है, जो मल के साथ बाहर निकल जाते हैं।यकृतनाइट्रोजनी पदार्थों को निष्कासित करने में सहायक
मूत्र निर्माण
नेफ्रॉन उत्सजी तथा परासरण नियमन प्रकायाँ को तीन चरणों में पूरा करते हैं:
परानिस्पंदन (Ultrafiltration)
चयनात्मक पुनःअवशोषण (Selective reabsorption)
नालिकीय स्रवण (Tubular secretion)
यूरोक्रोम की उपस्थिति के कारण सामान्य मूत्र पीले रंग का होता है जो हीमोग्लोबिन के विघटन से बनता है। मूत्र में उपस्थित अकार्बनिक लवण, क्लोराइड, फास्फेट और सल्फेट के रूप में सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम व मैग्निशियम होते हैं। यूरीनोयड (Urinoids) के कारण इसमें एरोमैटिक गन्ध होती है। मूत्र की स्पेशिफिक ग्रैबिटी 1.003–1.032 एवं pH सामान्यत: 6. 0 होता है।
डायलिसिस (अपोहन)
संक्रमण, आघात, रुधिर प्रवाह में अवरोध के कारण वृक्क निष्क्रिय हो सकते हैं। ऐसी अवस्था में रूधिर में अपशिष्ट पदार्थों का निस्पंदन करने, उसमें जल तथा आयन की पर्याप्त का प्रयोग किया जाता है, जो डायलिसिस (Dialysis) नामक तकनीक पर आधारित होती है।
किसी अन्य व्यक्ति के सुमेलित वृक्क का, रोगी के शरीर में प्रत्यारोपण ( Transplant) भी किया जा सकता है।
डायलिसिस के नियम अपोहन के उपकरण में सेल्युलोज की लम्बी कुंडलित नलियाँ अपोहन विलयन से भरी टंकी में लगी होती है। जब रुधिर इन नलियों से प्रवाहित होता है तब अपशिष्ट पदार्थ विसरित होकर टंकी के विलयन में आ जाता है। स्वच्छ रुधिर रोगी के शरीर में पुन: प्रविष्ट करा दिया जाता है।
तत्व यौगिक एवं मिश्रण
तत्व यौगिक एवं मिश्रण
विज्ञान कि वह शाखा जिसमें हम विभिन्न प्रकार के रसायनों एवं उनकी अभिक्रियाओं का अध्ययन करते है, रसायन विज्ञान कहलाती है।
लेबासिये को आधुनिक रसायन विज्ञान का जन्मदाता कहा जाता है।
परमाणु - द्रव्य का वह सबसे छोटा कण जिसका स्वतंत्र अस्तित्व केवल रासायनिक अभिक्रिया के दौरान ही सम्भव होता है परमाणु कहलाता है।
अणु - पदार्थ का सबसे छोटा कण जिसमें उस पदार्थ के सभी गुण मौजुद होते हैं तथा उसका स्वतंत्र अस्तित्व सम्भव हो।
तत्व - एक ही प्रकार के परमाणु से मिलकर बना पदार्थ तत्व कहलाता है।
जैसे - सोना, चांदी, आक्सीजन, हाइड्रोजन आदि।
प्रतिक - तत्वों को संकेत में लिखने को प्रतिक कहते है। बर्जीलियस ने 1813 में तत्वों के प्रतीकों के लिए एक रासायनिक प्रणाली दि जिसमें तत्वों के नाम लेटिन भाषा में थे।
यौगिक - दो या दो से अधिक तत्वों को एक निश्चित अनुपात में मिलाने से यौगिक बनता है।
जैसे - HCl(1:1),H2O(2:1)।
मिश्रण - दो या दो से अधिक पदार्थो को किसी भी अनुपात में मिलाने पर मिश्रण बनता है। जैसे - चीनी व नमक का घोल।
द्रव्य(पदार्थ) - जो स्थान घेरता है और जिसमें द्रव्यमान होता है, द्रव्य कहलाता है।
द्रव्य(पदार्थ) की अवस्थाएं(भौतिक वर्गीकरण)
ठोस अवस्था
द्रव अवस्था
गैसीय अवस्था
पदार्थ का रासायनिक वर्गीकरण
पदार्थ का अंतरारूपान्तरण

परमाणु संरचना
इलेक्ट्रान - कैथोड़ किरणों का निर्माण करने वाले ऋणावेशित कणों को इलेक्ट्रान कहते हैं।
इसकी खोज - जे. जे. थाॅमसन ने कि तथा इन्हें नाम स्टोनी ने दिया।
आवेश - 1.6*10^(-19) कुलाम
द्रव्यमान - 9.1*10^(-31) Kg. or 5.487*10^(-4) amu.
इलेक्ट्रान का द्रव्यमान हाइड्रोजन के द्रव्यमान का 1/1835 वां भाग होता है।
प्रोटाॅन - एनोड किरणों का निर्माण करने वाले धनावेशित किरणों को प्राटोन कहते है। इसकी खोज गोल्डस्टीन ने कि।
आवेश - 1.6*10-19 कुलाम
द्रव्यमान - 1.6725*10-24 gm.
न्युट्राॅन
खोज - जेम्स चैडिविक
आवेश - उदासिन या शुन्य
द्रव्यमान - 1.6749*10^(-24) gm.
पोजीट्राॅन
खोज - एंडरसन
इलेक्ट्रान के विपरित कण को पोजीट्रान कहते हैं।
द्रव्यमान व आवेश - इलेक्ट्राॅन के बराबर परन्तु प्रकृति विपरित।
तत्वों को साधारणतया धातु/अधातु तथा उपधाातु में वर्गीकृत किया जाता है।
धातु
ये विधुत व ताप के सुचालक होते हैं, इन्हें खींचा(तन्य) जा सकता है। तथा पीटकर फैलाया जा सकता है।
उदाहरण - सोना, चांदी, लोहा आदि।
पारा धातु होते हुए भी कमरे के ताप पर द्रव्य अवस्था में पाया जाता है।
अधातु
ये ताप व विधुत के कुचालक होते हैं।
उदाहरण - हाइड्रोजन, आयोडिन, क्लोरिन, कोल, कार्बन।
उपधातु
कुछ तत्व धातु व अधातु के बीच के गुणों को दर्शाते हैं। उसे उपधातु कहते हैं।
उदाहरण - बोरोन, सिलिकन आदि।
अभी तक ज्ञात तत्वों की संख्या 100 से भी ज्यादा है। जिसमें 92 तत्व प्राकृतिक है तथा शेष मानव निर्मित है।
यौगिक
दो या दो से अधिक तत्वों को एक निश्चित अनुपात में मिलाने से यौगिक बनता है।
सुत्र - प्रतीकों का वह समूह जो किसी पदार्थ के संगठन को व्यक्त करता है।
सुत्र मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं
अणु सूत्र
मुलानुपाती सूत्र
अणुसूत्र
वह सूत्र जो किसी यौगिक में उपस्थित विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की वास्तविक संख्या को दर्शाता है।
ग्लुकोज - C6H12O6, ऐसीटिक ऐसीड - CH3COOH।
मुलानुपातीसूत्र
वह सूत्र जो यौगिक के एक अणु में उपस्थित विभिन्न तत्वों के परमाणुओं के सरल अनुपात को प्रदर्शित करता है। मूलानुपाती सूत्र कहलाता है।
ग्लुकोज -CH2O, ऐसीटिक ऐसीड - CH2O।
मिश्रण दो प्रकार के होते हैं।
समांग
विषमांग
समांग - एक निश्चित अनुपात में समान रूप से सर्वत्र अवयवों के मिलने से बना मिश्रण समांग मिश्रण कहलाताह है।
उदाहरण - चीनी का जल में विलयन।
विषमांग - अनिश्चित अनुपात में असमान रूप से अवयवों के मिलने से बना मिश्रण विषमांग मिश्रण कहलाता है।
उदाहरण - धुल के कणों का हवा में मिश्रण।
महत्वपूर्ण तथ्य
शुष्क बर्फ - ठोस कार्बन डाइऑक्साइड को कहा जाता है।
सुर्य व तारों में चमक प्लाज्मा के कारण होती है।
प्लोरेसेंट ट्यूब और नियाॅन बल्ब में प्लाज्मा होता है।
ओजोन वायु में उपस्थित सर्वाधिक निष्क्रिय गैंस है।
हाइड्रोजन ब्रह्माण्ड में सर्वाधिक पाया जाने वाला तत्व है।
नाइट्रोजन वायुमण्डल में सर्वाधिक मात्रा में पाया जाने वाला तत्व है।
लीथियम सबसे हल्की धातु है।
एल्युमिनियम पृथ्वी पर सर्वाधिक पायी जाने वाली धातु है।
पारा एक मात्र द्रव्य धातु है।
सोडियम को अत्यन्त क्रियाशील होने के कारण इसे केरोसिन के तेल में रखा जाता है।
अम्लीय वर्षा - सल्फर डाईआक्साइड एवं नाइट्रोजन डाईआक्साइड से होती है। जो जल वाष्प से क्रिया कर अम्ल बनाती है।
कृत्रिम श्वसन में आक्सीजन व हीलियम का प्रयोग किया जाता है।
द्रव नाईट्रोजन का उपयोग पशुओं के विर्य को सुरक्षित रखने एवं कृत्रिम धुंए में किया जाता है।
Popular Posts
-
The Megalithic Background Megalith graves were encircled by big pieces of stones. They also contained pottery and iron objects buried with t...
-
The Rise and Growth of the Gupta Empire Background After the fall of Mauryan empire, the Kushans in the North and Satavahanas in the south h...
-
The history of the later Vedic period is based mainly on the Vedic texts which were compiled after the age of Rig Veda. 1. Later Vedic Tex...
-
Jahangir (1605 - 1627) Jahangir came to the throne in 1605. He issued 12 ordinances. He established Zanjir-il-Adal – Chain of Justice in A...
-
In this article, we have explained Northern India of 8th - 10th century. Many questions are asked about Palas, Pratiharas, and Rashtrakutas ...
-
The Organization of the Parliament The Parliament consists of the President, the Lok Sabha and the Rajya Sabha. Lok Sabha is the Lower House...
-
Heat energy is generated when current flows through a conductor. The heating effect of an electric current depends on below-given factors: T...
-
तत्व यौगिक एवं मिश्रण विज्ञान कि वह शाखा जिसमें हम विभिन्न प्रकार के रसायनों एवं उनकी अभिक्रियाओं का अध्ययन करते है, रसायन विज्ञान कहलाती है...
-
The remnants of the library of Nalanda, built in the 5th century BCE by Gupta kings. It was rebuilt twice after invasion, first after an inv...
-
Main Passes of Himalayas Aghil Pass: Situated to the north of K2 in the Karakoram. Joins Ladakh with the Xinjiang(Sinkiang) Province of ...
Featured post
Business Communication – Introduction Notes Business Communication is the ability of a group of individuals to speak the same langu...